हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण इन दिनों गंभीर विवाद के केंद्र में है। सहायक अभियंता प्रशांत सेमवाल और अधिशासी अभियंता राजन सिंह के खिलाफ जांच लंबित होने की चर्चाओं के बीच अब मामला खुलकर सियासी टकराव में बदलता नजर आ रहा है।
जन अधिकार पार्टी–जन शक्ति के राष्ट्रीय अध्यक्ष आजाद अली ने दोनों अधिकारियों को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ चेतावनी दी है कि जब तक जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक उनसे सभी प्रशासनिक और तकनीकी कार्यभार तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाना चाहिए।
जांच के बीच जिम्मेदारी क्यों बरकरार?
सूत्रों के मुताबिक, दोनों अधिकारियों के मामलों में जांच चल रही है, लेकिन इसके बावजूद वे अपने-अपने पदों पर कार्यरत हैं। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जांच के दौरान पद पर बने रहना निष्पक्षता को प्रभावित नहीं करता?
विशेषकर सहायक अभियंता प्रशांत सेमवाल को लेकर यह चर्चा भी सामने आई है कि उन्हें बचाने के लिए शासन स्तर पर सिफारिश की जा रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस प्रकार की चर्चाओं ने माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
अधिशासी अभियंता राजन सिंह के मामले में भी पारदर्शी कार्रवाई की मांग तेज हो रही है। विरोधी स्वर यह कह रहे हैं कि यदि प्रशासन निष्पक्ष है, तो दोनों मामलों में समान और सख्त कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
उपाध्यक्ष की भूमिका पर उठे सवाल
इन आरोपों के बीच प्राधिकरण की उपाध्यक्ष सोनिका का नाम भी चर्चा में है। विरोधी पक्ष का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट निर्णय लेने में देरी हो रही है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि जांच चल रही है, तो एहतियातन कार्यभार वापस लेने में हिचक क्यों?
हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
आजाद अली की दो टूक चेतावनी..
आजाद अली ने साफ शब्दों में कहा है कि—दोनों अधिकारियों से तत्काल प्रभाव से कार्यभार वापस लिया जाए,जांच प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया जाए,प्रशासन सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करे,उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में प्राधिकरण कार्यालय के बाहर बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा। यह विरोध केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा, बल्कि व्यापक जनसमर्थन के साथ किया जाएगा।
प्रशासन की अग्निपरीक्षा
यह मामला अब केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि HRDA की साख और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या जांच के दौरान निष्पक्षता दिखाने के लिए कड़ा निर्णय लिया जाएगा?
या फिर यह विवाद सड़कों पर उतरकर बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा फिलहाल संकेत साफ हैं—यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो HRDA के बाहर जल्द ही राजनीतिक गर्मी बढ़ सकती है।