जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में जुबानी जंग अब और तेज होती दिखाई दे रही है। जाति की राजनीति और हालिया आपराधिक घटनाओं को लेकर दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी लगातार बढ़ रही है। इसी कड़ी में राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ लोग हर घटना को जाति के नजरिए से देखने की कोशिश कर रहे हैं।
जयंत चौधरी ने लखनऊ में आयोजित पार्टी के कार्यक्रम में कहा कि राजनीति का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर चलना होना चाहिए। उन्होंने समाजवादी पार्टी की PDA राजनीति पर भी सवाल खड़े किए और कहा कि चौधरी चरण सिंह की राजनीति सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की थी।
‘हर घटना में जाति तलाशना सही नहीं’
जयंत चौधरी का सबसे बड़ा हमला हाल ही में सामने आए अंकित बालियान हत्याकांड को लेकर था। इस मामले को लेकर अखिलेश यादव ने यूपी की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए थे और जाट समुदाय में नाराजगी का जिक्र किया था।
इसके जवाब में जयंत चौधरी ने कहा कि हत्या जैसी गंभीर घटना में मृतक की जाति को तलाशना और फिर उसे किसी खास समुदाय के गुस्से से जोड़ना संवेदनशीलता के खिलाफ है। उनका कहना है कि अपराध के बाद सबसे पहले पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की बात होनी चाहिए, न कि घटना को जातीय खांचे में बांटा जाए।
PDA पर भी जयंत ने साधा निशाना
अखिलेश यादव की राजनीति में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग का मुद्दा लगातार प्रमुख रहा है। अब जयंत चौधरी ने इसी राजनीतिक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए इसे ‘पीड़ा और बौखलाहट’ से जोड़कर हमला किया।
उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति के पक्ष में नहीं थे। उनका जोर समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने और सभी समुदायों को साथ लेकर चलने पर था। जयंत ने संकेत दिया कि उनकी पार्टी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
‘ट्विटर-ट्विटर खेलने वाले नेता हर जगह जाति तलाश रहे’
अपने भाषण में जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव का नाम लेते हुए कहा कि कुछ नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हुए हर मामले में जाति तलाशने की कोशिश करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल चर्चा में आने और व्यूज हासिल करने के लिए लोग कई तरह के बयान दे देते हैं।
जयंत का आरोप है कि राजनीति में जातीय तनाव को बढ़ाने के बजाय लोगों के बीच भाईचारा मजबूत करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी विवाद को बढ़ाने से समाज का नुकसान होता है और राजनीतिक फायदे के लिए ऐसी स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।
‘यूपी को फिर उल्टा-पुल्टा करने की कोशिश’
जयंत चौधरी ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश की पिछली राजनीतिक व्यवस्था को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें प्रदेश को फिर उसी तरह की राजनीति में ले जाने की कोशिश कर रही हैं, जहां विवाद और जातीय तनाव को बढ़ावा मिलता है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार बनी रहनी चाहिए और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने चाहिए। उनके मुताबिक राजनीति का फोकस लोगों की समस्याओं के समाधान पर होना चाहिए, न कि समाज को अलग-अलग जातियों में बांटने पर।
2027 चुनाव से पहले क्यों बढ़ी सियासी गर्मी?
उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति तेज कर दी है। ऐसे में जातीय समीकरण एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। RLD भी अपने पारंपरिक समर्थन आधार से आगे बढ़कर अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी पश्चिमी यूपी के साथ-साथ ब्राह्मण समेत दूसरे वर्गों के बीच भी अपना आधार बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
वहीं समाजवादी पार्टी भी अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच हालिया बयानबाजी को सिर्फ व्यक्तिगत विवाद के तौर पर नहीं, बल्कि यूपी की बदलती चुनावी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
अखिलेश और जयंत के बीच पहले भी हो चुका है टकराव
अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच राजनीतिक रिश्ते पहले काफी करीब रहे हैं। दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि बाद में राजनीतिक समीकरण बदले और RLD ने 2024 लोकसभा चुनाव से पहले NDA का साथ चुना।
अब दोनों नेताओं के बीच जिस तरह जाति, जाट समुदाय और PDA जैसे मुद्दों पर बयान सामने आ रहे हैं, उससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है।
निष्कर्ष
जयंत चौधरी के ताजा बयान ने यूपी की जातीय राजनीति को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। एक तरफ अखिलेश यादव कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाकर सरकार पर हमला कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जयंत चौधरी जाति के आधार पर घटनाओं की राजनीतिक व्याख्या करने का विरोध कर रहे हैं। अब देखना होगा कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह जुबानी जंग किस दिशा में जाती है और इसका असर यूपी के राजनीतिक समीकरणों पर कितना पड़ता है।