देहरादून में 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर लोक भवन में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम ने जिला प्रशासन की कार्यशैली की पोल खोलकर रख दी। नियमों और प्रोटोकॉल की दुहाई देने वाले जिलाधिकारी देहरादून एक बार फिर खुद नियम तोड़ते हुए पकड़े गए, जिससे पूरे राज्य में प्रशासनिक मर्यादाओं की सरेआम धज्जियां उड़ गईं।
राज्यपाल के सामने डीएम नदारद
प्रोटोकॉल के अनुसार, राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद के कार्यक्रम में जिलाधिकारी की अनिवार्य उपस्थिति और अगुवानी (Receive) तय है। इसके बावजूद डीएम देहरादून न तो राज्यपाल के प्रोटोकॉल में मौजूद रहे और न ही अपनी अनुपस्थिति की कोई पूर्व सूचना दी। यह लापरवाही नहीं बल्कि खुला प्रोटोकॉल उल्लंघन मानी जा रही है।
अपर सचिव राज्यपाल ने मुख्य सचिव से की शिकायत
मामला इतना गंभीर रहा कि अपर सचिव, राज्यपाल को स्वयं मुख्य सचिव उत्तराखंड को औपचारिक शिकायत पत्र भेजना पड़ा। पत्र में स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है किvवरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति रही जिलाधिकारी देहरादून कार्यक्रम स्थल पर नहीं पहुंचे कोई पूर्व सूचना या वैध कारण नहीं दिया गया यह सीधे तौर पर राज्यपाल के पद और राज्य प्रोटोकॉल की अवमानना की श्रेणी में आता है।
पुराने विवादों का लंबा इतिहास
डीएम देहरादून का नाम पहले भी कई बार विवादों में रहा है—अधीनस्थ अधिकारियों को नियमों का हवाला देकर प्रताड़ित करने के आरोप,शासनादेशों की अनदेखी
बिना नियमों के निर्णय लेने की शिकायतें,प्रशासनिक तानाशाही और मनमानी कार्यशैली के आरोप
अब सवाल यह उठ रहा है कि जो अधिकारी खुद नियमों को रौंदता रहा हो, वह दूसरों से नियम पालन की उम्मीद किस आधार पर करता है?
प्रोटोकॉल नहीं, यह ‘अहंकार’ की प्रशासनिक मिसाल
प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो यह महज अनुपस्थिति नहीं बल्कि प्रोटोकॉल को हल्के में लेने की आदत और अहंकारी रवैये का परिणाम है। मुख्यमंत्री और राज्यपाल की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में जिलाधिकारी का गायब रहना पूरे सिस्टम पर प्रश्नचिह्न है।
अब सबसे बड़ा सवाल— क्या मुख्य सचिव इस गंभीर शिकायत पर कार्रवाई करेंगे? या फिर डीएम देहरादून एक बार फिर ‘बच निकलने’ में कामयाब हो जाएंगे? क्या नियम सिर्फ छोटे अफसरों के लिए हैं? प्रदेश में यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही की अग्निपरीक्षा बन चुका है।