नई दिल्ली: समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के बाद, जिसमें उन्होंने 2029 से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने की बात कही थी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। शाह का यह बयान 13 सितंबर 2026 को सामने आया था।
अरशद मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट के जरिए UCC को लेकर सरकार के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं किया जा सकता, जो उनके अनुसार शरीयत के प्रावधानों के विपरीत हो। मदनी ने इसे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
‘दीन और धर्म से समझौता नहीं’
मदनी ने कहा कि मुसलमान कई मामलों में समझौता कर सकता है, लेकिन अपने धर्म और दीन से समझौता नहीं करेगा। उनके मुताबिक, UCC का मुद्दा केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का भी विषय है।
उन्होंने दावा किया कि सरकार UCC के जरिए उन अधिकारों को सीमित करना चाहती है, जो संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता के तहत देता है। हालांकि, ये मदनी के राजनीतिक और कानूनी तर्क हैं और इन्हें उनके बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
गृह मंत्री का यह ऐलान कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी, एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे से?
समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों को…
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) September 16, 2026
उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंची जमीयत
अरशद मदनी ने बताया कि जमीयत उलमा-ए-हिंद ने UCC को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया है। उनके अनुसार, मामले में अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं और संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल समेत अन्य वकील अदालत में पक्ष रख रहे हैं।
मदनी ने कहा कि संगठन संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को बनाए रखने के पक्ष में है। उनका तर्क है कि UCC के प्रावधानों का परीक्षण संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 25 और 26 का भी किया जिक्र
मदनी ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लेख करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधानों की बात उठाई। उन्होंने सवाल किया कि यदि कुछ संवैधानिक प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को UCC से अलग रखा जा सकता है, तो धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों पर भी चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए।
उनका कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और इसी वजह से UCC को लेकर किसी भी बदलाव पर संवैधानिक प्रावधानों के साथ व्यापक चर्चा जरूरी है।
‘एक देश, एक कानून’ पर भी सवाल
मदनी ने ‘एक देश, एक कानून’ की अवधारणा को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारत में कई क्षेत्रों में राज्य स्तर पर अलग-अलग कानूनी प्रावधान और विशेष व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसी आधार पर उन्होंने UCC को पूरे देश में लागू करने की आवश्यकता और उसके स्वरूप पर सवाल उठाया।
उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कई मामलों में धार्मिक मान्यताओं की भूमिका है और ऐसे मामलों को लेकर समुदाय की चिंताओं पर विचार किया जाना चाहिए।
UCC को लेकर आगे भी जारी रहेगी बहस
अमित शाह के 2029 से पहले 21 NDA-शासित राज्यों में UCC लागू करने के बयान के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ सहयोगी दलों और विपक्षी नेताओं ने भी अलग-अलग रुख जाहिर किए हैं।
ऐसे में अरशद मदनी की प्रतिक्रिया ने UCC को लेकर चल रही बहस में धार्मिक स्वतंत्रता, पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों के सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आगे इस मामले में अदालतों और संबंधित राज्य सरकारों के फैसले महत्वपूर्ण होंगे।
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