नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई प्रलयकारी बाढ़ के बाद देश में राहत-बचाव का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। इसी दौरान नेपाल सरकार की ओर से भारत की भूमिका को खुले दिल से सराहा गया है। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नाजुक घड़ी में जिस तेजी और उदारता से मदद भेजी, वह काबिले-तारीफ है। अब तक इस आपदा में जान गंवाने वालों की संख्या 600 का आंकड़ा पार कर चुकी है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
कैसे मची यह तबाही
नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर के टूटने से बर्फ, चट्टानें और मलबे का सैलाब नीचे की बस्तियों की ओर बह निकला। देखते ही देखते इसने मध्य नेपाल के कई कस्बों-गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। घर, सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं इस प्रलय में बह गईं, और कई इलाकों का बाकी दुनिया से संपर्क पूरी तरह कट गया।
भारत की मदद: आंकड़ों में
- भारत ने अब तक करीब 57 टन से ज्यादा राहत सामग्री नेपाल भेजी है
- मेडिकल टीम और सुरंग-बचाव विशेषज्ञों वाला 11 सदस्यीय दल मौके पर पहुंचा
- नेपाल की अपील के फौरन बाद यह मदद रवाना की गई
- पुनर्निर्माण के लिए भी बड़ी सहायता का भरोसा दिया गया है
राहत-बचाव अभियान की स्थिति
नेपाली सेना अब तक करीब 1,900 से ज्यादा लोगों को हेलीकॉप्टर के जरिए सुरक्षित निकाल चुकी है। धुंचे, रसुवा और स्याफ्रुबेसी जैसे दुर्गम इलाकों तक सड़क मार्ग बंद होने के कारण हवाई रास्ते से ही राशन-दवाइयां पहुंचाई जा रही हैं। पूरे अभियान में 11 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी जुटे हैं, जिनमें आधे से ज्यादा सिर्फ नेपाली सेना के जवान हैं।
वित्त मंत्री वाग्ले के मुताबिक, फिलहाल प्राथमिकता जिंदगियां बचाने पर है। इसके बाद अस्थायी आवास बनाने, प्रभावितों को रोजगार के बदले भुगतान देने और अंततः बड़े स्तर पर पुनर्निर्माण की योजना पर काम होगा।
2015 के भूकंप की याद
वाग्ले ने याद दिलाया कि 2015 के विनाशकारी भूकंप के दौरान भी भारत नेपाल के साथ मजबूती से खड़ा रहा था। उनके मुताबिक, तब की तरह इस बार भी भारत सरकार का सहयोग नेपाल के लिए एक बड़ा सहारा साबित हो रहा है।