सरबजीत सिंह(Sarabjit Singh) को तो आप जानते ही होंगे। वही सरबजीत सिंह जिन्हें पकिस्तान ने भारत की ओर से जासूसी करने का दोष लगा गिरफ्तार कर लिया था। लगभग 13 सालोँ तक लम्बी कानूनी संघर्षों और अनगिनत टॉर्चर के पलों में अपनी रिहाई की उम्मीद लगाए बैठे थे सरबजीत। लेकिन घर वापसी की उम्मीद टूट गयी और उनका पाकिस्तान की सलाखों के पीछे बेरहमी से क़ त्ल कर दिया गया। बताया जाता है की जेल में बंद सरबजीत पर अन्य कैदियों ने हमला किया थे जिस वजह से उनकी मौत हो गयी। इन हमलावरों में एक था अमीर सरफराज तांबा जिसको आज अज्ञातों द्वारा मौत के घाट उतार दिया। ताम्बा की मौत की खबर ने आज तमाम भारतियों को सरबजीत सिंह की आपबीती की याद दिला दी है। भारत सरबजीत को सुरक्षित अपने घर नहीं ला पाया लेकिन पाकिस्तानी जेल में एक और सरबजीत कैद है। नाम है कुलभूषण जाधव(Kulbhushan Jadhav)।

कौन है Kulbhushan Jadhav?
कुलभूषण जाधव एक भारतीय नागरिक हैं जो इस वक्त पाकिस्तान की गिरफ्त में हैं। कुलभूषण जाधव को 2017 को जासूसी और आ कवाद के मामले में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था। उन पर भारत की खुफिया एजेंसी के इशारे पर पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी की गतिविधियां चलाने का आरो प है। हालाँकि भारत ने इस आरोपों से इनकार किया था। पाकिस्तान का दावा है कि पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी को 3 मार्च 2016 को बलूचिस्तान में गिरफ्तार किया गया था।
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव का जन्म 16 अप्रैल 1970 को महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता एक सेवानिवृत्त मुंबई पुलिस अधिकारी हैं। जाधव शादीशुदा हैं और उनके दो बच्चे हैं। उनका परिवार मुंबई में रहता है। कुलभषण जाधव को पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने सजा ऐ मौत सुनाई थी।पाकिस्तान के खिलाफ भारत ने जाधव की मौत की सजा को चुनौती देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अंतराष्ट्रीय अदालत ने 2019 में एक फैसला जारी किया था। इस फैसले में कहा गया की पाकिस्तान ,भारत को जाधव तक राजनयिक पहुंच दे। साथ ही कुलभूषण जाधव की सजा की समीक्षा भी सुनिश्चित करे।

कहीं Kulbhushan Jadhav ना बन जाये अगले Sarabjit Singh!
सरबजीत सिंह पंजाब के तरनतारन जिले में भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित भिखीविंड के रहने वाले थे।1990 में सरबजीत सिंह को भारत-पाक सीमा से पाकिस्तानी सीमा रक्षकों ने गिरफ्तार कर लिया था। उनकी पत्नी ने दावा किया कि वह वाघा सीमा के पास अपने खेतों में काम करने गए थे और वापस नहीं लौटे। सरबजीत पर शुरू में अवैध रूप से पाकिस्तान में प्रवेश करने का आरोप लगाया गया था, और बाद में फैसलाबाद और लाहौर में चार बम विस्फोटों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी।
1991 में, एक पाकिस्तानी अदालत ने उन्हें आ तं कवाद का दोषी पाया और पाकिस्तान सेना अधिनियम के तहत मौत की सजा सुनाई। बाद में एक उच्च न्यायालय ने फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद, दया की उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। 2012 में सरबजीत ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसफ अली जरदारी के सामने एक बार फिर दया की गुहार लगाई। इस बार उनकी मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। लेकिन 2013 में पकिस्तान से खबर आयी की सरबजीत पर अन्य कैदियों ने पत्थर और रॉड से हमला किया और उनकी मृत्यु हो गयी।
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