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बगदाद पैक्ट पाकिस्तान के लिए साबित हुआ था खोखला दावा, जंग में नहीं मिली किसी ‘दोस्त’ से मदद

TV7BHARAT
Last updated: 2026/08/11 at 3:07 AM
TV7BHARAT
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5 Min Read
बगदाद पैक्ट पाकिस्तान
बगदाद पैक्ट पाकिस्तान: पुराना 'इस्लामिक गठबंधन' फेल, अब मक्का समझौता
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1965 की जंग में टूटा पाकिस्तान का भरोसा

सितंबर 1965 की बात है। भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी पाकिस्तान में मोर्चा खोल दिया था और लाहौर के आसपास भीषण लड़ाई छिड़ चुकी थी। उस वक्त पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसके अरब सहयोगी देश जंग में उसका साथ देंगे, लेकिन यह भरोसा बुरी तरह टूट गया। दरअसल, यह पूरी उम्मीद 1955 में बने एक गठबंधन पर टिकी थी, जिसे समझने के लिए थोड़ा इतिहास में पीछे जाना जरूरी है।

Contents
1965 की जंग में टूटा पाकिस्तान का भरोसाशीत युद्ध के दौर में बना था बगदाद पैक्टभारत को घेरना चाहता था पाकिस्तानजंग के वक्त सभी सहयोगियों ने बनाई दूरी1971 की जंग में दो टुकड़ों में बंटा पाकिस्तानआखिरकार 1979 में भंग हो गया गठबंधनअब मक्का समझौते को बताया जा रहा ‘इस्लामिक नाटो’

शीत युद्ध के दौर में बना था बगदाद पैक्ट

1950 के दशक में दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो खेमों में बंटी हुई थी। अमेरिका को डर था कि सोवियत प्रभाव मध्य-पूर्व तक पहुंच सकता है, जिससे तेल आपूर्ति से लेकर यूरोप की सुरक्षा तक सब कुछ खतरे में पड़ सकता है। इसी आशंका के चलते 1955 में इराक, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और ब्रिटेन ने मिलकर बगदाद पैक्ट का गठन किया, जिसका मुख्यालय इराक की राजधानी में रखा गया। अमेरिका औपचारिक सदस्य तो नहीं बना, लेकिन उसने इस गठबंधन को भरपूर समर्थन दिया। बाद में 1959 में इराक के अलग होने के बाद इसका नाम बदलकर CENTO कर दिया गया।

भारत को घेरना चाहता था पाकिस्तान

गौरतलब है कि पाकिस्तान को सोवियत संघ से कोई खास खतरा नहीं था, वह पहले से ही अमेरिकी खेमे में शामिल था। असल में पाकिस्तान की नजर भारत पर टिकी हुई थी। इस समझौते की आड़ में पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों से सैन्य संबंध मजबूत किए, अमेरिकी हथियार और सैन्य प्रशिक्षण हासिल किया, जिससे उसकी सेना तेजी से आधुनिक होती गई। पाकिस्तान को लगने लगा कि इस सैन्य ताकत के दम पर वह भारत पर दबाव बना सकता है, जबकि हकीकत में अमेरिका इसे मुख्य रूप से कम्युनिस्ट विस्तार रोकने की रणनीति के तौर पर देख रहा था।

जंग के वक्त सभी सहयोगियों ने बनाई दूरी

जब 1965 का युद्ध छिड़ा, तो पाकिस्तान को उम्मीद थी कि CENTO के साथी देश उसकी मदद को आगे आएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अमेरिका ने दोनों पक्षों को हथियारों की आपूर्ति रोक दी, वहीं तुर्की और ईरान ने सिर्फ नैतिक समर्थन तक ही खुद को सीमित रखा। इस जंग ने पाकिस्तान को साफ एहसास करा दिया कि जिसे वह अपनी सुरक्षा गारंटी समझ रहा था, वह दरअसल अमेरिका की शीत युद्ध रणनीति का एक हिस्सा भर था।

1971 की जंग में दो टुकड़ों में बंटा पाकिस्तान

छह साल बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में यह सबक और गहरा हो गया। पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह के बीच जब जंग छिड़ी, तो पाकिस्तान ने एक बार फिर अपने सहयोगियों से मदद मांगी। अमेरिका ने दबाव बनाने के लिए अपना बेड़ा बंगाल की खाड़ी में जरूर भेजा, लेकिन कोई सीधा सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। तुर्की और ईरान ने भी सीमित कूटनीतिक समर्थन तक ही अपने आपको रखा। नतीजा यह निकला कि 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश एक नए देश के रूप में उभरा।

आखिरकार 1979 में भंग हो गया गठबंधन

विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की उस वक्त नाटो का सदस्य होने के चलते यूरोप की तरफ ज्यादा झुका हुआ था, जबकि ईरान अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं में उलझा था। इसके अलावा अमेरिका और ब्रिटेन दोनों ही भारत से सीधा टकराव मोल लेने से बचना चाहते थे। आखिरकार 1979 में ईरान की क्रांति के बाद ईरान और पाकिस्तान ने इस गठबंधन से किनारा कर लिया, और 16 मार्च 1979 को इसे औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया। इस तरह करीब 24 साल तक चला यह गठबंधन खत्म हो गया।

अब मक्का समझौते को बताया जा रहा ‘इस्लामिक नाटो’

गौरतलब है कि हाल ही में 7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का में एक नए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत तय हुआ है कि किसी एक देश पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा, जो कि नाटो के आर्टिकल-5 जैसा प्रावधान है। यही वजह है कि सुरक्षा विशेषज्ञ इसे ‘इस्लामिक नाटो’ करार दे रहे हैं। हालांकि इतिहास गवाह है कि इस तरह के गठबंधन जंग के वक्त कितने कारगर साबित होते हैं, यह पहले भी देखा जा चुका है।

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