नई दिल्ली। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऑनलाइन अपराधों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। निजी जानकारी लीक करने, डीपफेक तैयार करने, बिना सहमति के निजी कंटेंट प्रसारित करने और रेप या जान से मारने की धमकी देने जैसे मामलों में पीड़ितों को तत्काल राहत दिलाने की मांग अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। इस संबंध में दायर याचिका में गंभीर डिजिटल क्राइम के मामलों के लिए 24 से 48 घंटे के भीतर प्राथमिकता के आधार पर राहत देने वाली व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है।
डिजिटल क्राइम के मामलों में क्या मांग की गई?
याचिका में सुझाव दिया गया है कि डिजिटल क्राइम का शिकार व्यक्ति अपने क्षेत्र की जिला अदालत, हाई कोर्ट या किसी नामित ड्यूटी कोर्ट में तत्काल राहत के लिए आवेदन कर सके। आवेदन के साथ सत्यापित पहचान के अलावा, जहां संभव हो, संबंधित URL, स्क्रीनशॉट और घटना का टाइमस्टैम्प भी उपलब्ध कराया जा सके।
प्रस्ताव के अनुसार, अदालत ऐसे गंभीर मामलों पर 24 से 48 घंटे के भीतर प्राथमिकता के आधार पर विचार कर सकती है और अपने फैसले के कारण भी दर्ज कर सकती है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि 24-48 घंटे की समयसीमा फिलहाल याचिका में सुझाई गई व्यवस्था है। पीड़ितों को ऐसी राहत पाने का कोई मौजूदा कानूनी अधिकार इस आधार पर स्वतः हासिल नहीं हो जाता।
किन मामलों को किया गया शामिल?
याचिका में शारीरिक या यौन हिंसा और हत्या की धमकी, वास्तविक खतरे की आशंका वाले डॉक्सिंग मामलों, बच्चों की निजी जानकारी, फोटो, स्कूल या लोकेशन सार्वजनिक करने जैसे मामलों को गंभीर श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है।
इसके अलावा बिना सहमति के निजी या AI से बनाए गए कंटेंट और गंभीर नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक या डिजिटल इम्पर्सोनेशन को भी इस व्यवस्था के दायरे में लाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऑनलाइन कंटेंट कुछ ही सेकंड में कॉपी, सेव, मिरर और दोबारा अपलोड किया जा सकता है। ऐसे में कार्रवाई में देरी से पीड़ित की निजता, प्रतिष्ठा और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
कंटेंट हटाने के साथ सबूत सुरक्षित रखने पर जोर
याचिका में पूरे प्लेटफॉर्म को प्रभावित करने वाले व्यापक आदेश के बजाय संबंधित URL और विशिष्ट कंटेंट तक कार्रवाई सीमित रखने का सुझाव दिया गया है। साथ ही URL, टाइमस्टैम्प, अपलोडर की जानकारी, मेटाडेटा और अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने की बात कही गई है, ताकि कंटेंट हटाए जाने या दोबारा अपलोड होने की स्थिति में जांच प्रभावित न हो।
सेंसरशिप को लेकर भी स्पष्टता
याचिका में कहा गया है कि प्रस्ताव का इस्तेमाल राजनीतिक भाषण, पत्रकारिता, जनहित की रिपोर्टिंग, व्यंग्य, पैरोडी, आलोचना, राय या अकादमिक और कानूनी टिप्पणी के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सामान्य मानहानि के मामलों के लिए मौजूदा कानूनी रास्ते जारी रखने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता को अपनी मांग संबंधित अधिकारियों के सामने रखने को कहा है। गृह मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को इस प्रतिनिधित्व की जांच करने को कहा गया है।