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Politics

यूपी में कुर्मी वोटरों पर क्यों बढ़ा फोकस? BJP से सपा तक की नजर

Editorial Team
Last updated: 2026/08/15 at 8:15 PM
Editorial Team
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8 Min Read
कुर्मी वोटर
akhilesh yadav (AI Image)
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उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। राजनीतिक दल अपने संगठन को मजबूत करने के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच कुर्मी वोटर एक बार फिर यूपी की चुनावी राजनीति के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं।

Contents
कुर्मी समाज को लेकर राजनीतिक दल क्यों सक्रिय?यूपी में कुर्मी समाज की आबादी कितनी है?कितनी सीटों पर असर डाल सकते हैं कुर्मी वोटर?BJP की रणनीति में कुर्मी समाज क्यों अहम?सपा भी गैर-यादव OBC पर दे रही जोरकुर्मी वोट किसी एक पार्टी के साथ क्यों नहीं?90 के दशक से बढ़ी कुर्मी नेताओं की राजनीतिक भूमिका2027 में क्या होगा कुर्मी वोटरों का रुख?सिर्फ जातीय समीकरण से तय नहीं होगा चुनाव

BJP से लेकर समाजवादी पार्टी तक गैर-यादव OBC वोटों को लेकर रणनीति बना रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कुर्मी समाज को राज्य के प्रभावशाली OBC समूहों में गिना जाता है और कई विधानसभा क्षेत्रों में इसका चुनावी असर माना जाता है।

हालांकि, जातियों की आबादी से जुड़े आंकड़ों के लिए अलग-अलग स्रोतों और अनुमानों में अंतर है। इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम आधिकारिक आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।

कुर्मी समाज को लेकर राजनीतिक दल क्यों सक्रिय?

उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यादव वोटों का एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा माना जाता है, जबकि कुर्मी वोटरों का समर्थन अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों की ओर जाता रहा है।

यही स्थिति कुर्मी वोटर को राजनीतिक दलों के लिए खास बनाती है। पार्टियों को लगता है कि अगर इस समुदाय का पर्याप्त समर्थन हासिल किया जाए तो कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदले जा सकते हैं।

कुर्मी मतदाताओं का प्रभाव खास तौर पर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और तराई के कई इलाकों में चर्चा में रहा है।

यूपी में कुर्मी समाज की आबादी कितनी है?

उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। हुकुम सिंह समिति की रिपोर्ट में कुर्मी और पटेल समुदाय की आबादी करीब 7.4 प्रतिशत बताई गई थी। यह आंकड़ा पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड पर आधारित था।

बाद के वर्षों में राज्य की आबादी बढ़ने के साथ समुदाय की कुल संख्या भी बढ़ी है। हालांकि, जाति आधारित विस्तृत और ताजा आधिकारिक जनगणना आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण वर्तमान प्रतिशत को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना मुश्किल है।

यही वजह है कि चुनावी विश्लेषण में संख्या के साथ-साथ किसी समुदाय के भौगोलिक प्रभाव और मतदान व्यवहार को भी देखा जाता है।

कितनी सीटों पर असर डाल सकते हैं कुर्मी वोटर?

राजनीतिक विश्लेषणों में उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर कुर्मी वोटर को प्रभावशाली माना जाता है। कुछ अनुमानों में 70 से 80 विधानसभा सीटों तक इनके असर की बात कही जाती है, जबकि व्यापक क्षेत्रीय आकलन इससे अधिक सीटों को प्रभावित क्षेत्र में रखता है।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि किसी सीट पर किसी जाति की बड़ी आबादी होना और उस जाति का चुनाव परिणाम तय करना एक ही बात नहीं है।

उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन, सरकार का प्रदर्शन और दूसरे सामाजिक समूहों का मतदान व्यवहार भी नतीजे पर असर डालता है।

BJP की रणनीति में कुर्मी समाज क्यों अहम?

BJP ने पिछले एक दशक में गैर-यादव OBC समूहों के बीच अपना आधार मजबूत किया है। कुर्मी समाज भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

अपना दल (एस) के साथ BJP का गठबंधन भी इसी सामाजिक समीकरण से जुड़ा एक प्रमुख राजनीतिक घटनाक्रम रहा है। अनुप्रिया पटेल जैसे नेताओं की भूमिका ने कुर्मी समाज के एक हिस्से को NDA के साथ जोड़ने में मदद की।

2022 के विधानसभा चुनाव में BJP के टिकट पर बड़ी संख्या में कुर्मी/पटेल उम्मीदवारों की जीत भी पार्टी की रणनीति की चर्चा का हिस्सा रही।

अब 2027 से पहले पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ पुराने समर्थन को बनाए रखने की नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक माहौल में इस सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की भी है।

सपा भी गैर-यादव OBC पर दे रही जोर

समाजवादी पार्टी की राजनीति में भी पिछले कुछ वर्षों में गैर-यादव OBC समूहों पर फोकस बढ़ा है।

अखिलेश यादव ने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को अपनी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया है। इसके तहत पार्टी यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर अन्य पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

इसी रणनीति में कुर्मी वोटर भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

पार्टी संगठन और चुनावी टिकटों में गैर-यादव पिछड़ी जातियों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश सपा की इसी रणनीति का हिस्सा बताई जाती है।

कुर्मी वोट किसी एक पार्टी के साथ क्यों नहीं?

यही शायद सबसे बड़ा कारण है कि BJP और सपा दोनों इस समुदाय पर नजर बनाए हुए हैं।

यादवों की तरह कुर्मी समाज को किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी वोट बैंक मानना आसान नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार और राजनीतिक गठबंधन के आधार पर मतदान का रुख बदल सकता है।

यही फ्लेक्सिबिलिटी चुनावी राजनीति में कुर्मी वोटर को खास बनाती है।

एक मजबूत स्थानीय उम्मीदवार कई बार जातीय समीकरण को पार्टी के पारंपरिक समर्थन से अलग दिशा में भी ले जा सकता है।

90 के दशक से बढ़ी कुर्मी नेताओं की राजनीतिक भूमिका

उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक के बाद OBC राजनीति के विस्तार के साथ कुर्मी नेताओं की भूमिका भी बढ़ी।

सपा और बसपा ने अलग-अलग दौर में कुर्मी नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति में जगह दी। BJP ने भी बाद में गैर-यादव OBC राजनीति को मजबूत करते हुए कुर्मी समाज के नेताओं को आगे बढ़ाया।

2014 के बाद BJP और अपना दल के बीच गठबंधन ने इस समीकरण को और राजनीतिक महत्व दिया। इसके बाद कुर्मी समाज के कई नेता राष्ट्रीय और राज्य की राजनीति में प्रमुख भूमिकाओं में दिखाई दिए।

2027 में क्या होगा कुर्मी वोटरों का रुख?

2027 विधानसभा चुनाव में कुर्मी समाज का रुख किस पार्टी के पक्ष में जाएगा, यह अभी तय नहीं कहा जा सकता।

BJP अपने मौजूदा सामाजिक गठबंधन को मजबूत करना चाहेगी। वहीं सपा गैर-यादव OBC वोटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस और बसपा भी अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर सकती हैं।

इसलिए आने वाले महीनों में टिकट वितरण, गठबंधन, स्थानीय मुद्दे और कुर्मी नेताओं की राजनीतिक सक्रियता पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

सिर्फ जातीय समीकरण से तय नहीं होगा चुनाव

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनावी नतीजे केवल जातीय आंकड़ों से तय नहीं होते। बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, किसान मुद्दे, सरकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार और क्षेत्रीय विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं।

इसलिए कुर्मी वोटर भले ही 2027 की रणनीति में महत्वपूर्ण समूह बनकर उभर रहे हों, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर मतदान के समय ही साफ होगी।

ये भी पढ़ें: स्कूल ठीक करो अभियान की शुरुआत, सरकारी स्कूलों की सुविधाओं पर सवाल

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TAGGED: BJP, उत्तर प्रदेश राजनीति, कुर्मी वोटर, यूपी चुनाव 2027, समाजवादी पार्टी
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