2027 का यूपी विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, सियासी सरगर्मी का सबसे बड़ा केंद्र पश्चिमी यूपी बनता जा रहा है। कभी यह इलाका बसपा सुप्रीमो मायावती की सबसे मजबूत जमीन हुआ करता था। अब उसी जमीन पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद — लेकिन कांग्रेस ने इस बार उन्हें आसानी से आगे नहीं बढ़ने देने की ठान ली है।
मिशन-2027 के तहत कांग्रेस ने हाल ही में अपने छह नए राष्ट्रीय सह-प्रभारियों में यूपी को जोन के हिसाब से बांटा है, और हर जोन की कमान सोच-समझकर, जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर सौंपी गई है।
पश्चिमी यूपी की कमान अब दलित हाथों में
पार्टी ने वेस्ट जोन — यानी सहारनपुर, मेरठ और मुरादाबाद मंडल के 14 जिलों — की जिम्मेदारी संजीव आर्य को दी है। संजीव दलित समुदाय से आते हैं और उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य के बेटे हैं। वह खुद विधायक रह चुके हैं और चूंकि उत्तराखंड की सीमा सहारनपुर-मुजफ्फरनगर से लगती है, इस इलाके की नब्ज़ से भलीभांति परिचित माने जाते हैं।
बाकी बचे पश्चिमी जिलों — आगरा, मथुरा, अलीगढ़, बरेली जैसे इलाकों — को ब्रज जोन में रखा गया है, जिसकी कमान मध्य प्रदेश के कुणाल चौधरी को सौंपी गई है। इसके अलावा अवध, प्रयाग, बुंदेलखंड और पूर्वांचल जोन के लिए भी अलग-अलग प्रभारी तय किए गए हैं।
इससे पहले पार्टी दलित चेहरे राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रदेश प्रभारी बना चुकी है — यानी वेस्ट यूपी में दलित नेतृत्व को आगे लाने की यह कोई इकलौती चाल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सीरीज़ है।
चंद्रशेखर की नज़र, कांग्रेस की काट
चंद्रशेखर आजाद खुद सहारनपुर से आते हैं और जाटव समाज से ताल्लुक रखते हैं — वही जाटव वोट बैंक, जिसके दम पर मायावती चार बार यूपी की कुर्सी तक पहुंचीं। नगीना लोकसभा सीट से सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर की महत्वाकांक्षा साफ है: पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम वोटों को जोड़कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना। उनकी अब तक की प्रत्याशी घोषणाओं में भी इन्हीं दो समुदायों को प्राथमिकता मिली है।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस का निशाना भी ठीक यही समीकरण है। संजीव आर्य के साथ-साथ पार्टी ने पश्चिमी यूपी के मुस्लिम वोटों को साधने की जिम्मेदारी अपने मुखर सांसद इमरान मसूद को दे रखी है। सपा से गठबंधन के चलते मुस्लिम वोट पहले से ही कांग्रेस-सपा गठजोड़ के साथ ज्यादा एकजुट माने जाते हैं, जिससे बिखराव की गुंजाइश कम रहती है।
यानी संजीव आर्य और इमरान मसूद की यह जोड़ी सीधे तौर पर उसी दलित-मुस्लिम समीकरण को भेदने की कोशिश में है, जिस पर चंद्रशेखर आजाद की सारी सियासी उम्मीदें टिकी हैं।
आगे की राह
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि उस सामाजिक आधार का है जिस पर दशकों तक बसपा का दबदबा रहा। कांग्रेस अब उसी जमीन पर नए सिरे से पकड़ बनाने उतरी है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि चंद्रशेखर आजाद इस चुनौती से पार पाते हैं या पश्चिमी यूपी की सियासत में कांग्रेस अपनी पुरानी जमीन दोबारा हासिल कर लेती है।