कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने Delimitation Bill को लेकर केंद्र सरकार की रणनीति पर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि बजट सत्र के दौरान सरकार की ओर से पेश किए गए इस विधेयक को विपक्ष की एकजुटता के चलते संसद में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। जयराम रमेश के मुताबिक, सरकार को 17 अप्रैल को उस समय बड़ा झटका लगा, जब विधेयक मतदान में पास नहीं हो सका।
Delimitation Bill पर विपक्ष ने कैसे बनाई रणनीति?
जयराम रमेश के अनुसार, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी और डीएमके समेत कई विपक्षी दलों ने फ्लोर मैनेजमेंट में सरकार का साथ नहीं दिया। विपक्षी दलों की एकजुटता के कारण सरकार आवश्यक संख्या जुटाने में सफल नहीं हो पाई।
रमेश ने दावा किया कि सरकार को उम्मीद थी कि वह संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लेगी, लेकिन विपक्षी दलों के समन्वित रुख ने उसकी रणनीति को झटका दिया।
उन्होंने कहा कि अब सरकार अपनी इस विफलता का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस नेता के मुताबिक, असल स्थिति यह है कि सरकार सदन में जरूरी बहुमत जुटाने में नाकाम रही।
डीएमके समेत इन दलों ने नहीं दिया सरकार का साथ
जयराम रमेश ने बताया कि इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ सपा, एनसीपी और डीएमके भी खड़े रहे। उन्होंने विशेष तौर पर डीएमके की भूमिका का जिक्र किया और कहा कि कुछ राजनीतिक मतभेदों के बावजूद पार्टी ने फ्लोर मैनेजमेंट में विपक्ष का साथ दिया।
तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव का हवाला देते हुए रमेश ने कहा कि राज्य की मांग थी कि परिसीमन नहीं होना चाहिए। इसके अलावा लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बरकरार रखने और राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव नहीं करने की बात भी कही गई थी।
महिला आरक्षण पर भी विपक्ष की अलग मांग
Delimitation Bill से जुड़े विवाद में महिला आरक्षण भी अहम मुद्दा रहा। विपक्ष की मांग थी कि लोकसभा की मौजूदा सीटों के आधार पर ही महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया जाए।
कांग्रेस का तर्क रहा कि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़ने के बजाय मौजूदा लोकसभा सीटों पर ही लागू किया जाना चाहिए। जयराम रमेश ने कहा कि तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव और कांग्रेस की मांग में इस मुद्दे पर समानता है।
17 अप्रैल को क्या हुआ था?
लोकसभा में 17 अप्रैल 2026 को परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वें संशोधन) विधेयक पर मतदान हुआ। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया। विधेयक के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े।
विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोट जरूरी थे। इस तरह सरकार आवश्यक आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई और विधेयक पारित नहीं हो सका।
सरकार पर ‘नैरेटिव मैनेजमेंट’ का आरोप
जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि विधेयक पास नहीं होने के बाद अब वह राजनीतिक नैरेटिव को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि सरकार विपक्ष पर दोष मढ़कर अपनी असफल रणनीति को छिपाना चाहती है।
कांग्रेस नेता के मुताबिक, Delimitation Bill पर सरकार की सबसे बड़ी चुनौती दो-तिहाई बहुमत जुटाना थी और विपक्षी दलों के एक साथ आने से यह संख्या पूरी नहीं हो सकी।
आगे भी जारी रह सकती है राजनीतिक लड़ाई
परिसीमन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव आगे भी जारी रहने के संकेत हैं। विपक्ष लोकसभा की मौजूदा सीटों और राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव को लेकर अपनी आपत्तियां पहले ही जाहिर कर चुका है।
वहीं, महिला आरक्षण को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। ऐसे में Delimitation Bill आने वाले समय में संसद के साथ-साथ राजनीतिक बहस का भी बड़ा मुद्दा बना रह सकता है।
साफ है कि इस पूरे घटनाक्रम में विपक्ष की एकजुटता ने सरकार के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की चुनौती को और बढ़ा दिया।