भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम से इन दिनों चोटों की खबरें थमने का नाम नहीं ले रहीं, और इसी माहौल में दिग्गज सुनील गावस्कर ने वो बात कह दी जो शायद बहुत कम लोग खुलकर कहते हैं। गावस्कर के मुताबिक, खिलाड़ी बार-बार इसलिए चोटिल नहीं हो रहे क्योंकि फिजियो अपना काम ठीक से नहीं कर रहे, बल्कि असली गड़बड़ी टीम की तैयारी के तरीके में छिपी है।
एक के बाद एक, कितने खिलाड़ी हुए बाहर
पिछले कुछ समय का हिसाब लगाया जाए तो टीम इंडिया की इंजरी लिस्ट काफी लंबी नजर आती है। स्टार पेसर जसप्रीत बुमराह घुटने की तकलीफ से जूझ रहे हैं। इसके अलावा हार्दिक पंड्या, हर्षित राणा, नीतीश कुमार रेड्डी, साई सुदर्शन और वरुण चक्रवर्ती — ये सभी अलग-अलग वजहों से मैदान से दूर रह चुके हैं। इनमें एक पैटर्न साफ नजर आता है: ज्यादातर मामले हैमस्ट्रिंग से जुड़े हैं।
ताजा उदाहरण गॉल टेस्ट से आया, जहां पहले ही दिन ओपनर केएल राहुल को क्रैम्प्स के चलते मैदान बीच में ही छोड़ना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर पूरे मसले को सुर्खियों में ला दिया।
फिजियो नहीं, सिस्टम कठघरे में — गावस्कर की राय
जब भी कोई खिलाड़ी चोटिल होकर बेंगलुरु स्थित BCCI के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) पहुंचता है, आम तौर पर निशाना वहां मौजूद फिजियो बन जाते हैं। गावस्कर इस सोच से सहमत नहीं दिखे। अपने कॉलम में उन्होंने पुराने दिन याद करते हुए लिखा कि उनके दौर में भी हैमस्ट्रिंग की समस्याएं आती थीं, मगर उन्हें ट्रेनिंग के जरिए संभाला जाता था। उनका सीधा सवाल था — अगर चोटें बार-बार लौट रही हैं, तो इसका मतलब कहीं न कहीं ट्रेनिंग प्रोसेस में कमी है, फिर सारा दोष इलाज करने वालों पर क्यों मढ़ा जाता है।
लक्ष्मण की बात से इत्तेफाक, फिजियो को क्लीन चिट
विवाद के बीच CoE की कमान संभाल रहे पूर्व बल्लेबाज वीवीएस लक्ष्मण ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका सेंटर कोई रिहैब सेंटर नहीं है। गावस्कर ने अपने कॉलम में लक्ष्मण की इस दलील को पूरा समर्थन दिया। उनका इशारा साफ था कि जांच की सुई इलाज देने वालों की बजाय मैच-पूर्व तैयारी और वर्कलोड मैनेजमेंट की तरफ घूमनी चाहिए।
नेट्स में गेंदों की गिनती पर भी उठा सवाल
गावस्कर ने एक और दिलचस्प मुद्दा छेड़ा — आजकल बायोमैकेनिक्स के नाम पर गेंदबाजों को नेट सेशन में तय सीमा से ज्यादा गेंदें डालने ही नहीं दी जातीं। उनका कहना था कि कई विदेशी फिजियो नेट्स में बीस गेंदों के बाद गेंदबाज को रोक देते हैं, जबकि मैच के दौरान एक ओवर पूरा करने में औसतन चौबीस गेंदें लग जाती हैं (नो-बॉल और वाइड को छोड़कर)। सवाल यही है — जब अभ्यास में ही उतना लोड नहीं दिया जाएगा, तो असली मैच के दबाव के लिए शरीर तैयार कैसे होगा।
‘जिम में फिट दिखना अलग बात है, मैदान पर फिट रहना अलग’
कॉलम के आखिर में गावस्कर ने वो लाइन लिखी जो अब सबसे ज्यादा चर्चा में है — उनके मुताबिक आज के खिलाड़ी जिम में मसल बनाने पर जितना ध्यान देते हैं, उतना मैच फिटनेस पर नहीं देते, जबकि मैदान पर टिके रहने के लिए दूसरी तरह की फिटनेस चाहिए होती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि शायद वे पुरानी पीढ़ी से हैं इसलिए उनकी सोच अलग हो सकती है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि बार-बार लौट रही चोटों को गंभीरता से देखे बिना यह समस्या हल होने वाली नहीं है।
अब निगाहें BCCI और टीम मैनेजमेंट पर
गावस्कर के इस कॉलम ने बहस को नई दिशा दे दी है — अब चर्चा सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे ट्रेनिंग स्ट्रक्चर पर पहुंच गई है। आने वाले महीनों में टीम को कई बड़ी सीरीज खेलनी हैं, ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि BCCI और सपोर्ट स्टाफ इस पर कोई ठोस बदलाव करते हैं या नहीं।
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