उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक छोटे से कस्बे नवाबगंज से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो लाखों स्टूडेंट्स के लिए मिसाल बन सकती है। यहां के अल्ताफ ने आठ साल तक लगातार असफलताओं का सामना करने के बावजूद हार नहीं मानी और आखिरकार NEET 2026 में सफलता हासिल कर ली। खास बात यह है कि जिस परिवार में अल्ताफ पले-बढ़े, वहां पिता आज भी सड़क किनारे आलू बेचकर घर चलाते हैं।
सात साल की नाकामी के बाद आठवें प्रयास में मिली मंजिल
अल्ताफ ने पहली बार 2019 में NEET की परीक्षा दी थी, जिसमें उन्हें महज 323 अंक मिले थे। इसके बाद के वर्षों में उनके अंक धीरे-धीरे बढ़ते गए—2022 में 516, फिर 2023 और 2024 में करीब 590 तक पहुंचे—लेकिन हर बार बढ़ते कटऑफ के आगे उनका मेडिकल कॉलेज में दाखिले का सपना अधूरा रह जाता। 2025 में अंक थोड़ा गिरकर 501 रह गए, जिससे निराशा और गहरी हो गई। लेकिन 2026 में आठवें प्रयास में उन्होंने 563 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक 27,910 और OBC कैटेगरी में 13,437वीं रैंक पाई—जो उनके लिए डॉक्टर बनने के सपने का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
भाई के सड़क हादसे ने बदल दी सोच की दिशा
12वीं पास करने के बाद अल्ताफ भी पिता के साथ आलू की फड़ पर बैठने लगे थे। इसी दौरान एक रात करीब दो बजे उनके बड़े भाई का बरेली मंडी से आलू लाते वक्त सड़क हादसा हो गया। इस घटना ने अल्ताफ को भीतर तक झकझोर दिया और उन्हें एहसास हुआ कि जिंदगी में कुछ अलग करना जरूरी है। नवाबगंज कस्बे से हर साल कई बच्चे NEET क्रैक कर मेडिकल कॉलेज पहुंचते हैं—उन्हें देखकर भी अल्ताफ के अंदर डॉक्टर बनने की जिद मजबूत होती गई।
बिना कोचिंग के सालों तक तैयारी, फिर कोटा का रुख
शुरुआती वर्षों में अल्ताफ के पास कोचिंग जाने के पैसे नहीं थे। ऐसे में उन्होंने कोटा से पढ़कर लौटे कस्बे के दोस्तों से नोट्स और स्टडी मैटेरियल जुटाए, ऑनलाइन लेक्चर देखे और घर पर ही तैयारी जारी रखी। लेकिन जब लगातार असफलता मिलती रही, तो उन्हें समझ आया कि सही मार्गदर्शन के बिना मंजिल दूर ही रहेगी। इसके बाद उन्होंने कोटा जाकर कोचिंग करने का फैसला किया—और इसके लिए पैसे जुटाने को पिता के साथ मिलकर खुद भी आलू बेचना शुरू कर दिया।
दो कमरों में 12 लोगों का परिवार, फिर भी नहीं टूटा हौसला
अल्ताफ के पिता इकबाल हुसैन अंसारी केवल नौवीं तक पढ़े हैं और मां अनपढ़ हैं। पूरा परिवार आलू बेचकर ही गुजारा करता है। 2015 तक यह परिवार कच्चे मकान में रहता था, बाद में दो कमरों का पक्का मकान बना, जिसमें 12 सदस्य साथ रहते थे। अल्ताफ के एक बड़े भाई और आठ बहनें हैं, जिनकी शादी हो चुकी है—इन जिम्मेदारियों के बीच परिवार के पास ज्यादा बचत कभी नहीं रही। इसी तंगी के बावजूद अल्ताफ ने पढ़ाई से मुंह नहीं मोड़ा।
कोटा में मिली वह दिशा, जो सात साल में नहीं मिल पाई
अल्ताफ के मुताबिक, कोटा पहुंचकर एक ही साल में उन्हें वह सीखने को मिला जो पिछले सात वर्षों की स्वयं-तैयारी में नहीं मिल सका था। एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट में फैकल्टी और साथी छात्रों के सहयोग ने उनकी तैयारी को नई दिशा दी। अल्ताफ ने यूपी बोर्ड से 10वीं और 12वीं में करीब 85 प्रतिशत अंक हासिल किए थे, जो दिखाता है कि उनकी बुनियाद हमेशा से मजबूत थी—बस सही मंच का इंतजार था।
एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट के फाउंडर नवीन माहेश्वरी का कहना है कि कोटा ऐसी ही संघर्ष भरी सफलताओं की धरती है, जहां आकर छात्र अपनी असली क्षमता पहचानते हैं और बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
पिता बोले—कभी सोचा नहीं था बेटा डॉक्टर बनेगा
अल्ताफ के पिता इकबाल हुसैन का कहना है कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनका बेटा डॉक्टर बनेगा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी क्षमता भर बेटे का साथ दिया। उन्हें भी यही लगता है कि अगर अल्ताफ पहले ही कोटा पहुंच जाते, तो शायद सफलता जल्दी मिल जाती।
संघर्ष की सीख: देर हो सकती है, हार नहीं
2019 में 323 अंकों से शुरू हुआ यह सफर 2026 में 563 अंकों तक पहुंचा—बीच में आठ प्रयास, आर्थिक तंगी, आलू की फड़ पर पिता का साथ, दोस्तों के नोट्स और आखिर में कोटा की सही गाइडेंस। अल्ताफ की कहानी यही बताती है कि मंजिल भले देर से मिले, लगातार कोशिश करने वालों को आखिरकार सफलता जरूर मिलती है।