ट्रंप IMEC समर्थन को लेकर खुलकर सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की अगुवाई वाले इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को न सिर्फ अहम बताया, बल्कि इसे ईरान के प्रभाव से मुक्त एक वैकल्पिक ऊर्जा रास्ते के तौर पर भी पेश किया। यह बयान संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मौके पर गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल और अरब देशों के नेताओं के साथ हुई एक अहम बैठक के दौरान आया।
ट्रंप का IMEC समर्थन: क्या कहा वॉशिंगटन ने
बैठक में ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि पड़ोसी देशों में कमर्शियल शिपिंग पर हुए ईरानी हमलों ने यह साबित कर दिया है कि मिडिल ईस्ट को अपने ऊर्जा ढांचे को उन रास्तों से हटाना होगा, जहां तेहरान की वजह से रुकावट पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि उनका प्रशासन IMEC कॉरिडोर का पुरजोर समर्थन करता है, चाहे यह पाइपलाइन के जरिए हो या किसी और माध्यम से तेल-गैस बाहर निकालने का तरीका हो।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बना वजह
ट्रंप का यह बयान ऐसे वक्त आया है जब ईरान की गतिविधियों के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। यह जलमार्ग दुनिया की करीब 20 फीसदी ऊर्जा सप्लाई का जरिया माना जाता है। 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल इसी रास्ते से गुजरा, वहीं वैश्विक LNG कारोबार का भी करीब पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर जाता है। इतने बड़े पैमाने की सप्लाई किसी एक चोकपॉइंट पर निर्भर होना ही अमेरिका और खाड़ी देशों दोनों के लिए चिंता की जड़ बना हुआ है।
फरवरी से बढ़ा तनाव, शिपिंग पर पड़ा असर
फरवरी माह के अंत में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर हमला शुरू होने के बाद तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज से गुजरने वाली शिपिंग को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। इसके चलते इस अहम जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट दर्ज की गई। इसी रुकावट ने वैश्विक ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं, जिससे खाड़ी देश अब तेल-गैस परिवहन के लिए वैकल्पिक और सुरक्षित रास्तों की तलाश में जुट गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप का IMEC समर्थन कहीं ज्यादा अहम माना जा रहा है।
जानिए क्या है IMEC कॉरिडोर
IMEC यानी इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को साल 2023 में नई दिल्ली में हुए G20 शिखर सम्मेलन के दौरान दुनिया के सामने रखा गया था। यह एक मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट है, जो दो हिस्सों में बंटा है — ईस्टर्न कॉरिडोर और नॉर्दर्न कॉरिडोर। ईस्टर्न कॉरिडोर भारत के प्रमुख बंदरगाहों को खाड़ी देशों के पोर्ट से जोड़ता है, जबकि नॉर्दर्न कॉरिडोर सऊदी अरब और जॉर्डन होते हुए जमीनी रास्ते से इजरायल के हाइफा पोर्ट तक पहुंचता है। वहां से यह भूमध्य सागर के रास्ते यूरोप के टर्मिनलों से जुड़ जाता है। इस पूरे नेटवर्क का मकसद एशिया, मिडिल ईस्ट और यूरोप के बीच सामान और ऊर्जा के परिवहन के लिए एक भरोसेमंद वैकल्पिक रास्ता तैयार करना है।
आगे क्या बदल सकता है
ट्रंप IMEC समर्थन के जरिए एक साफ संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका अब ऊर्जा सुरक्षा के मामले में ईरान-केंद्रित निर्भरता को कम करना चाहता है। अगर यह कॉरिडोर तेजी से आगे बढ़ता है, तो इससे न सिर्फ भारत की क्षेत्रीय भूमिका मजबूत होगी, बल्कि खाड़ी देशों को भी होर्मुज जैसे संवेदनशील चोकपॉइंट पर निर्भरता घटाने का एक ठोस विकल्प मिल सकता है। हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को जमीन पर उतरने में अभी वक्त लगेगा।
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