बिहार मॉडल की सफलता, गुजरात का संगठनात्मक अनुभव और योगी का चेहरा — 2027 के लिए BJP का नया चुनावी समीकरण
2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने अपनी संगठनात्मक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी ने महाराष्ट्र के विनोद तावड़े और गुजरात के जगदीश ईश्वरभाई पटेल को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी है। 18 अगस्त को BJP राष्ट्रीय अध्यक्ष की तरफ से तावड़े को प्रदेश प्रभारी और पटेल को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया।
तावड़े पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सांसद हैं, जबकि पटेल हाल ही में राष्ट्रीय सचिव बनाए गए हैं। दोनों की नियुक्ति को BJP के लिए एक बड़े चुनावी प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है।
2024 का झटका, अब बड़ी चुनौती
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BJP को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ा था। पार्टी की सीटें 62 से घटकर सीधे 33 पर आ गई थीं। विपक्ष ने संविधान, आरक्षण और पीडीए जैसे मुद्दों को उठाकर BJP के परंपरागत सामाजिक समीकरण में सेंध लगाई थी। यही वजह है कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए सिर्फ सत्ता में बने रहने का सवाल नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की बुनियाद तैयार करने की पहली बड़ी परीक्षा भी माना जा रहा है।
तावड़े की पहचान: बूथ और संगठन पर पकड़
राजनीतिक जानकारों के अनुसार तावड़े ऐसे नेता माने जाते हैं जो चुनाव को सिर्फ बड़ी रैलियों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि बूथ स्तर के संगठन, सामाजिक समीकरण और उम्मीदवार चयन को उतनी ही अहमियत देते हैं। छात्र जीवन से ही संघ और एबीवीपी से जुड़े तावड़े महाराष्ट्र में संगठन और सरकार दोनों में काम कर चुके हैं।
2022 में जब तावड़े को बिहार का प्रभारी बनाया गया था, तब हालात BJP के पक्ष में नहीं थे — नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर महागठबंधन में जा चुके थे। तावड़े ने बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करने पर फोकस किया, जिसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखा जब एनडीए ने बिहार की 243 में से करीब 175 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनाई। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की बड़ी जीत ने इस रणनीति पर मुहर लगा दी।
बिहार का फॉर्मूला यूपी में कितना कारगर?
अब सवाल यह है कि बिहार में कामयाब रहा मॉडल क्या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जटिल राज्य में भी उतना ही असरदार साबित होगा। यूपी में 403 विधानसभा सीटें हैं, पश्चिम से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं, दर्जनों प्रभावशाली जातीय समूह हैं, और पार्टी के भीतर टिकट व संगठन को लेकर असंतोष भी मौजूद है। यही सब मिलकर तावड़े-पटेल की जोड़ी की असली परीक्षा तय करेंगे।
संगठन को चुनावी मशीनरी में बदलने की चुनौती
तावड़े के लिए सबसे पहला काम कोई चुनावी नारा गढ़ना नहीं, बल्कि मौजूदा संगठन को एक पूरी तरह सक्रिय चुनावी मशीनरी में तब्दील करना होगा। हाल में हुए संगठनात्मक फेरबदल में प्रदेश इकाई के बड़े हिस्से के साथ-साथ सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्षों को भी बदला गया है, जिसे इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
टिकट वितरण भी तावड़े के लिए एक संवेदनशील मोर्चा रहेगा। पार्टी के भीतर चर्चा है कि इस बार बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट बदले जा सकते हैं, हालांकि अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा। स्थानीय नाराजगी दूर करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर टिकट कटने से पैदा होने वाले असंतोष को संभालना भी उनके लिए उतनी ही बड़ी चुनौती होगी।
जगदीश पटेल की भूमिका क्यों अहम?
तावड़े के साथ सह-प्रभारी बनाए गए जगदीश ईश्वरभाई पटेल गुजरात BJP में लंबे समय तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभा चुके हैं और अहमदाबाद की अमराईवाड़ी सीट से विधायक भी रह चुके हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी नेताओं में गिना जाता है, और 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी में पार्टी के चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका की खासी चर्चा रही थी।
पटेल खुद बता चुके हैं कि वे बीते कई सालों से यूपी के कामकाज से जुड़े रहे हैं, और अब औपचारिक रूप से यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। माना जा रहा है कि जहां तावड़े व्यापक संगठनात्मक और चुनावी रणनीति पर काम करेंगे, वहीं पटेल जमीनी प्रबंधन और खासतौर पर पूर्वी व मध्य उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को साधने की जिम्मेदारी संभालेंगे।
राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम के मुताबिक, गुजरात का मॉडल यूपी में हूबहू लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां जातीय और क्षेत्रीय समीकरण कहीं अधिक जटिल हैं। ऐसे में पटेल के सामने गुजरात के अनुभव को यूपी की जमीनी हकीकत के हिसाब से ढालने की चुनौती रहेगी।
योगी का चेहरा अब भी सबसे बड़ी पूंजी
BJP के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व अब भी सबसे बड़ा राजनीतिक भरोसा है। 2017 और 2022 दोनों चुनावों में पार्टी ने उनके नेतृत्व में सरकार बनाई थी, और 2027 में भी योगी सरकार की उपलब्धियां ही पार्टी की मुख्य रणनीति का आधार रहेंगी।
लेकिन 2024 के नतीजों ने यह भी साफ कर दिया कि अकेले हिंदुत्व और सरकार की उपलब्धियों के भरोसे चुनाव जीतना अब आसान नहीं रहा। विपक्ष ने संविधान और पीडीए जैसे मुद्दों के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलित समूहों में सेंध लगाई थी। ऐसे में कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, निषाद, राजभर और जाटव जैसे समुदायों के बीच भरोसा फिर से मजबूत करना तावड़े-पटेल की जोड़ी के लिए बड़ी प्राथमिकता होगी।
इसके साथ ही अपना दल और निषाद पार्टी जैसे सहयोगी दलों को सीट बंटवारे और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर साथ बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
आगे की राह
तावड़े और पटेल दोनों के पास संगठन में काम करने का लंबा अनुभव है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वे इस अनुभव को यूपी जैसी विशाल और जटिल राजनीतिक जमीन पर सफलतापूर्वक उतार पाएंगे। बिहार में तावड़े ने विधानसभा-वार आंकड़ों, सामाजिक गठबंधन और संगठनात्मक नेटवर्क के जरिए चुनाव को समझने और साधने का तरीका दिखाया था। अब यूपी में उनके सामने इससे कहीं बड़ी और पेचीदा चुनौती है।