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Reading: Islamic Law In India की मांग पर विवाद, साजिद रशीदी के बयान से गरमाई बहस; खालिद रशीद बोले- देश संविधान से चलेगा
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Islamic Law In India की मांग पर विवाद, साजिद रशीदी के बयान से गरमाई बहस; खालिद रशीद बोले- देश संविधान से चलेगा

TV7BHARAT
Last updated: 2026/08/30 at 10:20 AM
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7 Min Read
Islamic Law In India
Islamic Law In India की मांग पर मौलाना साजिद रशीदी के बयान से बहस तेज हो गई। खालिद रशीद ने कहा- भारत संविधान के अनुसार चलेगा।
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भारत में Islamic Law In India लागू करने की मांग को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी के एक बयान के बाद इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। रशीदी ने अपराध, दुष्कर्म और भ्रष्टाचार जैसे मामलों पर सख्ती के लिए इस्लामिक कानून लागू करने की बात कही थी।

Contents
साजिद रशीदी ने क्या कहा?खालिद रशीद ने जताई असहमतिभारत में धर्म और कानून को लेकर क्या है बहस?रशीदी के समर्थन में भी आई प्रतिक्रियाअयोध्या के संत ने भी किया बयान का विरोधअपराध रोकने के लिए कानून से ज्यादा जरूरी क्या?Islamic Law In India पर आगे भी जारी रह सकती है बहस

उनके बयान पर इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि भारत की शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार चलती है और किसी भी धार्मिक व्यवस्था को संवैधानिक ढांचे से अलग नहीं देखा जा सकता।

साजिद रशीदी ने क्या कहा?

मौलाना साजिद रशीदी ने एक बातचीत के दौरान देश में बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए Islamic Law In India की जरूरत बताई। उन्होंने दावा किया कि इस्लामिक कानून के तहत गंभीर अपराधों के लिए बेहद सख्त सजा का प्रावधान है।

रेप जैसे गंभीर अपराध का उदाहरण देते हुए रशीदी ने शरिया कानून में बताई जाने वाली सजा का उल्लेख किया और कहा कि सख्त कानून होने से अपराधों पर रोक लगाई जा सकती है।

हालांकि, उनका यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इसको लेकर बहस शुरू हो गई। बयान के समर्थकों ने इसे अपराध रोकने के लिए सख्त व्यवस्था की मांग बताया, जबकि विरोध करने वालों ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का हवाला दिया।

खालिद रशीद ने जताई असहमति

मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने साजिद रशीदी के बयान को उचित नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में कानून और शासन व्यवस्था संविधान के अनुसार चलती है।

खालिद रशीद के मुताबिक, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म और धार्मिक मान्यताओं का पालन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता देश के संवैधानिक ढांचे के भीतर ही है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत में दुष्कर्म, हत्या, चोरी और दूसरे अपराधों से निपटने के लिए पहले से कानून मौजूद हैं। इसलिए धार्मिक नेताओं को अपराधियों के खिलाफ मौजूदा कानूनी व्यवस्था का सम्मान करते हुए समाज में जागरूकता और सुधार के लिए काम करना चाहिए।

भारत में धर्म और कानून को लेकर क्या है बहस?

Islamic Law In India की मांग के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत में व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं और देश के कानून के बीच सीमा क्या है।

भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है। यहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों को अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करने का अधिकार प्राप्त है। दूसरी ओर, आपराधिक मामलों में देश की कानूनी व्यवस्था लागू होती है।

इसी वजह से धार्मिक व्यक्तिगत कानून और आपराधिक कानून को लेकर होने वाली चर्चाओं में संविधान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं का पालन देश के कानून और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप ही किया जाता है।

रशीदी के समर्थन में भी आई प्रतिक्रिया

साजिद रशीदी के बयान का जहां खालिद रशीद ने विरोध किया, वहीं कुछ लोगों ने उनका समर्थन भी किया है। आगरा की खुद्दाम-ए-रोजा ताजमहल उर्स कमेटी से जुड़े ताहिरुद्दीन ताहिर ने रशीदी की बात का समर्थन करते हुए सऊदी अरब जैसे देशों में लागू सख्त कानूनों का उदाहरण दिया।

उन्होंने दावा किया कि अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान होने से दुष्कर्म, छेड़छाड़ और चोरी जैसे अपराधों को नियंत्रित किया जा सकता है।

हालांकि, किसी दूसरे देश की कानूनी व्यवस्था को भारत में लागू करने का सवाल केवल सजा की कठोरता तक सीमित नहीं है। भारत की अपनी संवैधानिक व्यवस्था, संसद द्वारा बनाए गए कानून और न्यायिक प्रणाली है, जिसके तहत आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है।

अयोध्या के संत ने भी किया बयान का विरोध

इस विवाद में अयोध्या के संत दिवाकराचार्य महाराज की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने साजिद रशीदी के बयान का विरोध करते हुए कहा कि भारत में संविधान सर्वोच्च है।

उनका कहना है कि देश में कानून और व्यवस्था संविधान के आधार पर चलती है। किसी भी धार्मिक व्यवस्था को संविधान से ऊपर रखने की मांग उचित नहीं हो सकती।

इस तरह एक ही बयान पर मुस्लिम समुदाय से जुड़े धार्मिक नेताओं के बीच भी अलग-अलग राय देखने को मिली है। एक पक्ष सख्त धार्मिक कानूनों को अपराध रोकने का माध्यम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष संवैधानिक व्यवस्था को सर्वोपरि मान रहा है।

अपराध रोकने के लिए कानून से ज्यादा जरूरी क्या?

दुष्कर्म और अन्य गंभीर अपराधों पर चर्चा करते समय केवल सजा की कठोरता ही मुद्दा नहीं होती। अपराध की रोकथाम के लिए पुलिस व्यवस्था, त्वरित जांच, पीड़ितों को सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को समय पर सजा मिलना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर पहले से कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे मामलों में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर लगातार चर्चा होती रही है।

इसी संदर्भ में धार्मिक नेताओं की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग राय है। खालिद रशीद का कहना है कि धार्मिक नेतृत्व को समाज में जागरूकता बढ़ाने और बुराइयों को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए।

Islamic Law In India पर आगे भी जारी रह सकती है बहस

मौलाना साजिद रशीदी के बयान ने Islamic Law In India को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, इस मुद्दे पर सामने आई प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट है कि धार्मिक मान्यताओं, व्यक्तिगत कानून और संवैधानिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।

एक तरफ रशीदी जैसे नेता सख्त धार्मिक कानूनों को अपराध नियंत्रण से जोड़ रहे हैं, वहीं खालिद रशीद और दिवाकराचार्य जैसे लोगों ने संविधान को सर्वोच्च बताते हुए ऐसी मांगों पर सवाल उठाया है।

फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की कानूनी व्यवस्था संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के आधार पर संचालित होती है। इसी संवैधानिक ढांचे के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत मान्यताओं का अधिकार भी मौजूद है।

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