हरियाणा के करनाल जिले में पराली जलाने पर कार्रवाई को लेकर प्रशासन ने कमर कस ली है। धान की कटाई शुरू होते ही जिला प्रशासन और कृषि विभाग पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। खेतों में आग लगाने की घटनाओं पर लगाम कसने के लिए अलग-अलग विभागों से जुड़े 750 से ज्यादा अधिकारियों और कर्मचारियों को गांव-गांव भेजा गया है। यह टीमें एक ओर किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान समझाएंगी, तो दूसरी ओर नियम तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेंगी।
उल्लंघन करने वालों पर क्या होगा असर
प्रशासन ने साफ कर दिया है कि जागरूक किए जाने के बावजूद जो किसान अपने खेत में आग लगाएंगे, उन पर मुकदमा दर्ज होगा और उनका नाम रेड लिस्ट में डाला जाएगा। इसका सीधा असर यह होगा कि ऐसे किसान अगले दो सीजन तक अपनी फसल सरकारी मंडी में नहीं बेच पाएंगे। यानी पराली जलाने पर कार्रवाई अब सिर्फ जुर्माने तक सीमित न रहकर किसानों की आमदनी से सीधे जुड़ गई है।
पिछले साल 23 मामले, इस बार लक्ष्य शून्य
कृषि विभाग के मुताबिक बीते साल जिले में पराली जलाने के 23 मामले सामने आए थे। इस बार विभाग ने इस आंकड़े को पूरी तरह शून्य पर लाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए विभाग के पास बेलर सहित जरूरी मशीनरी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, ताकि किसान बिना आग लगाए भी अपने खेत खाली कर सकें।
इन-सीटू और एक्स-सीटू तकनीक पर ₹1200 प्रति एकड़ प्रोत्साहन
फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सरकार इन-सीटू और एक्स-सीटू तकनीक अपनाने वाले किसानों को 1200 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दे रही है। कृषि विभाग इस योजना को लेकर भी किसानों को लगातार जागरूक कर रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान पराली को जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करें।
स्कूल-कॉलेजों में भी चलाया जा रहा अभियान
सिर्फ खेतों तक ही जागरूकता अभियान सीमित नहीं है। विभाग ने बताया कि स्कूलों और कॉलेजों में भाषण और स्लोगन जैसी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा रही हैं, जिनके जरिए युवा पीढ़ी को भी फसल अवशेष प्रबंधन के तरीकों की जानकारी दी जा रही है, ताकि यह संदेश हर घर तक पहुंच सके।
जिले में कितनी पैदावार, कितना निकलेगा अवशेष
करनाल जिले में इस सीजन करीब साढ़े चार लाख एकड़ में धान की खेती हुई है, जिसमें से अब तक करीब 10 फीसदी फसल की कटाई पूरी हो चुकी है। अनुमान है कि इस धान की फसल से करीब 9 लाख मीट्रिक टन फसल अवशेष निकलेगा। विभाग का दावा है कि इस विशाल मात्रा के प्रबंधन के लिए जिले में पर्याप्त मशीनरी मौजूद है।
निगरानी के लिए सैटेलाइट का भी सहारा
केवल फील्ड अधिकारियों पर निर्भर न रहते हुए प्रशासन पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट तकनीक की मदद भी लेगा, जिससे किसी भी इलाके में आग की घटना तुरंत पकड़ में आ सके।
पर्यावरण और सेहत पर पड़ता है सीधा असर
अधिकारियों ने बताया कि गांव पंचायतों को भी इस जागरूकता अभियान से जोड़ा जा रहा है, जिससे जिले में एक भी मामला सामने न आए। पराली जलाने से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर भी पड़ता है और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ने का खतरा रहता है।
किसानों से क्या अपील की गई
प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे फसल को पूरी तरह सुखाने के बाद ही मंडी लेकर जाएं और कटाई के बाद बचे फसल अवशेष का सही तरीके से प्रबंधन करें। विभाग का कहना है कि इससे किसानों को खुद फायदा होगा और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचेगा। अगर किसी किसान को फसल अवशेष प्रबंधन में कोई दिक्कत आती है, तो वह नजदीकी कृषि विभाग कार्यालय से संपर्क कर सकता है।
ये भी पढ़ें: