राजस्थान के चर्चित महावीर जी मंदिर विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। श्वेतांबर और दिगंबर जैन संप्रदायों के बीच वर्षों से चल रहे इस प्रबंधन विवाद पर सुनवाई करते हुए अदालत ने दोनों पक्षों के प्रति नाराजगी भी जताई और सवाल किया कि क्या इस मुकदमेबाजी से भगवान प्रसन्न होंगे।
जस्टिस पारदीवाला की तीखी टिप्पणी
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील मामला है। पीठ ने पूछा कि क्या दोनों पक्ष चाहते हैं कि सुबह श्वेतांबर अपनी रीति से पूजा करें और शाम को दिगंबर भगवान का श्रृंगार बदलकर अपनी परंपरा के अनुसार अनुष्ठान करें। अदालत ने कहा कि जिन भगवान को दुनिया के महानतम संतों में गिना जाता है, उन्हें इस तरह विवाद में क्यों घसीटा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1959 की धारा 40 के तहत दायर एक आवेदन से जुड़ा है, जिसमें दिगंबर समिति के पदाधिकारियों को हटाकर श्वेतांबर प्रबंधन समिति गठित करने की मांग की गई थी। वर्ष 1994 में ट्रायल कोर्ट ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के आधार पर इस कार्यवाही को समाप्त कर दिया था। बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, जिसके विरोध में दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने दलील दी कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए हाईकोर्ट को अपील स्वीकार ही नहीं करनी चाहिए थी। वहीं श्वेतांबर पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि वे मंदिर का धर्म परिवर्तन नहीं चाहते, इसलिए 1991 का अधिनियम इस मामले पर लागू ही नहीं होता।
अदालत ने तय किया सीमित दायरा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केवल 1991 के अधिनियम की धारा 4 के लागू होने के सीमित प्रश्न पर ही विचार करेगी। दोनों पक्षों को आठ दिनों के भीतर लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। जस्टिस पारदीवाला ने दोनों पक्षों से आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की अपील भी की।
वैवाहिक दुष्कर्म कानून पर भी अहम फैसला
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले प्रावधान की संवैधानिक वैधता जांचने का भी फैसला लिया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ अगले महीने से इस पर विस्तृत सुनवाई करेगी। मामले में आईपीसी की धारा 375 के अपवाद-2 और बीएनएस की धारा 63 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत पति-पत्नी के बीच बिना सहमति संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाता।
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