Ayodhya Ram Mandir: एक लम्बे अरसे के इंतज़ार के बाद अब आखिरकार अयोध्या में श्री राम पूर्ण रूप से स्थापित हो जाएंगे। 22 जनवरी को निर्माणाधीन राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की जायेगी। अयोध्या में राम मंदिर के गर्भगृह में स्थापित होने वाली रामलला की मूर्ति का चयन 29 दिसंबर को किया गया था। रामलला के दर्शन को ललायित श्रद्धालुओं को यह पता चल जाएगा कि तीन विकल्पों में से किस मूर्ति को चुना गया है। और यह 17 जनवरी को ही पता चलेगा जब रामलला को ‘नगर यात्रा’ के लिए निकाला जाएगा। मैसूर के मूर्तिकार अरुण योगीराज द्वारा बनाई गई भगवान राम की मूर्ति को अयोध्या के भव्य श्री राम मंदिर में स्थापना के लिए चुना गया है।

प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या असीम आस्था की नगरी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री राम के स्वर्ग प्रस्थान के बाद वे प्रतिमा स्वरूप में हमेशा के लिए अयोध्या में स्थापित हो गए थे। इसके साथ ही एक मान्यता ये भी है की उज्जैन के राजा महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या में श्री राम की जन्मस्थली पर मंदिर का निर्माण कर श्रीराम की प्रतिमा स्थापित की थी। इतिहास के वाक्यों की माने तो सन 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राम मंदिर का विघ्वंस किया था। इसी दौरान ओरछा की महारानी महाराज विक्रमादित्य द्वारा स्थापित श्रीराम की मूर्ति को वहां से ओरछा ले गयी थी।आज तक राम जन्मभूमि पर श्रीराम की जो प्रतिमा विराजमान है वो 22 दिसंबर 1949 को स्थापित की गई थी।
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जब ओरछा की रानी के साथ बाल रूप में निकले श्रीराम!
श्री राम की मूल प्रतिमा को लेकर एक और मान्यता है। ओरछा के राजा मधुकर शाह की पत्नी रानी गणेशकुंवर भगवान राम की पूजा करती थीं। एक बार अपने पति द्वारा उनकी भक्ति पर प्रश्न उठाये जाने पर वह पैदल ही अयोध्या के लिए निकल पड़ी। उन्होंने कसम खाई कि वह राम के बाल रूप के साथ ही लौटेंगी। अन्यथा अयोध्या में ही सरयू नदी में डूब कर अपने प्राण त्याग देंगी। रानी ने जैसे ही अपनी यात्रा शुरू की, उन्होंने अपने सेवक को आदेश दिया कि जब वह भगवान राम के साथ वापस आएंगी तो वह भगवान राम के लिए एक मंदिर (चतुर्भुज मंदिर) बनाएंगी। सरयू नदी पर रानी ने भगवान राम की प्रार्थना करना शुरू कर दिया और उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। भगवान राम उनकी प्रार्थनाओं से प्रभावित हुए और उनकी इच्छाओं को पूरा करने का वचन दिया, रानी ने भगवान राम से बाल रूप में उनके साथ ओरछा आने का अनुरोध किया। भगवान राम बाल रूप में उनके साथ जाने को तैयार तो हो गए लेकिन उन्होंने कुछ शर्तें रखीं।
Ayodhya Ram Mandir और Raja Raam Mahal!
श्री राम ने उनके सामने ये शर्त रखी की मैं साधु-संतों की टोली के साथ अयोध्या से ओरछा तक पैदल यात्रा करूंगा। एक और शर्त थी की चूँकि राम का बाल रूप रानी की गोद में विचरण करेगा, अत: जिस प्रथम स्थान पर मैं बैठूँगा वही मेरा अंतिम निवास स्थान होगा और वह स्थान रामराज के नाम से प्रसिद्ध होगा। रानी ने सहर्ष अपने इष्टदेव की सभी शर्तें मान लीं। भगवान राम को गोद में लेकर रानी ने ओरछा की यात्रा शुरू की। सन 1574-1575 के दौर की ये घटना बताई जाती है जब पैदल अयोध्या से ओरछा पहुंचने में 8 महीने और 27 दिन लगे क्योंकि यात्रा केवल पुख नक्षत्र में ही हुई थी।

ओरछा पहुंचने के बाद, रानी अगले दिन भगवान राम को चतुर्भुज मंदिर ले जाने के इरादे से अपने कमरे में शिशु भगवान राम के साथ अपने महल में लौट आईं। रानी आखिरी शर्त भूल गई और भगवान राम एक मूर्ति बनकर रानी के महल में स्थापित हो गए। आज तक राम राजा मंदिर रानी के महल में है। मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में स्थानांतरित नहीं किया जा सका।