देहरादून। बद्रीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि संस्कृति महोत्सव को लेकर उठे विवाद पर उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर अनावश्यक भ्रम फैलाया जा रहा है। मंत्री के अनुसार महोत्सव का उद्देश्य सीमांत क्षेत्र की संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा देना था, न कि किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना।
नर और नारायण पर्वत का अंतर
सतपाल महाराज ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि बद्रीनाथ क्षेत्र में दो पर्वत हैं, नर और नारायण। भगवान बद्री विशाल का मंदिर नारायण पर्वत पर स्थित है। वहीं, सांस्कृतिक कार्यक्रम नर पर्वत पर बने टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित किया गया था। उन्होंने साफ कहा कि यह आयोजन मंदिर परिसर में नहीं हुआ। इसलिए मंदिर की पवित्रता से जुड़े सवाल उठाना उचित नहीं है।
शंख को लेकर उठे सवाल पर जवाब
विवाद के दौरान शंख बजाने को लेकर भी सवाल उठे थे। इस पर मंत्री ने कहा कि बद्रीनाथ क्षेत्र में शंख बजता है, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में पूजा के समय शंख नहीं बजाया जाता। इसके पीछे मान्यता है कि शंख जीव की हड्डी से बनता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भगवान के कपाट खुलने और बंद होने के अवसर पर सेना का बैंड हमेशा बजाया जाता है, जो वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।
बाइट: सतपाल महाराज, पर्यटन मंत्री, उत्तराखंड
उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने बद्रीनाथ धाम में हुए देवभूमि संस्कृति महोत्सव को लेकर उठे विवाद पर अपनी बात रखी। अपनी बाइट में उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बद्रीनाथ में नर और नारायण दो पर्वत हैं। भगवान बद्री विशाल का मंदिर नारायण पर्वत पर स्थित है, जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रम नर पर्वत पर बने टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में हुआ, मंदिर परिसर में नहीं।
शंख को लेकर उठे सवाल पर मंत्री ने कहा कि बद्रीनाथ में शंख बजता है, लेकिन गर्भगृह में पूजा के दौरान शंख नहीं बजाया जाता, क्योंकि मान्यता है कि शंख जीव की हड्डी से बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि कपाट खुलने और बंद होने पर सेना का बैंड हमेशा बजता है।
सतपाल महाराज ने कहा कि पिछली सरकारों ने भी यहाँ कार्यक्रम किए हैं। उनके अनुसार महोत्सव का मकसद सीमांत संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा देना था, इसे आस्था पर हमला मानना गलत है।
पिछली सरकारों में भी हुए आयोजन
सतपाल महाराज ने कहा कि बद्रीनाथ में सांस्कृतिक कार्यक्रम पहली बार नहीं हुए हैं। पिछली सरकारों के कार्यकाल में भी यहाँ इस तरह के आयोजन किए जाते रहे हैं। उन्होंने स्थानीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि क्षेत्र के लोगों की शादियों और अन्य शुभ अवसरों पर ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं, जो यहाँ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
आस्था पर हमला कहना गलत
मंत्री ने कहा कि महोत्सव को आस्था पर हमले के रूप में देखना उचित नहीं है। उनके अनुसार इस तरह के आयोजनों से सीमांत गाँवों की लोक संस्कृति को मंच मिलता है और पर्यटन को भी गति मिलती है। इससे स्थानीय लोगों की आजीविका के अवसर बढ़ते हैं और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत देश-दुनिया तक पहुँचती है।
पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर
पर्यटन मंत्री ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि चारधाम यात्रा के साथ-साथ राज्य की लोक कला, संगीत और परंपराओं को भी पहचान मिले। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया देने से पहले तथ्यों को समझा जाए और भ्रम फैलाने से बचा जाए।
बद्रीनाथ की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान
मंत्री ने यह भी कहा कि बद्रीनाथ धाम की धार्मिक परंपराओं और मर्यादाओं का पूरा सम्मान किया जाता है। मंदिर के भीतर की पूजा-पद्धति और नियम अपनी जगह यथावत हैं, और उनमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है।
रिपोर्ट: आकाश, देहरादून
ये भी पढ़ें: