उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही बीजेपी के लिए अवध और सेंट्रल यूपी का इलाका एक बार फिर अहम हो गया है। इसी बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता कौशल किशोर की नाराजगी और पूर्व एमएलसी हीरा ठाकुर के कांग्रेस में शामिल होने से बीजेपी के सामाजिक समीकरणों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
कौशल किशोर ने हाल के दिनों में पार्टी के भीतर अपनी अनदेखी का मुद्दा सार्वजनिक रूप से उठाया है। वहीं, हीरा ठाकुर का बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामना विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर माना जा रहा है। दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखा जाए तो ये सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम लग सकते हैं, लेकिन अवध क्षेत्र की जातीय राजनीति के संदर्भ में इनका असर महत्वपूर्ण हो सकता है।
कौशल किशोर की नाराजगी क्यों महत्वपूर्ण है?
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व सांसद कौशल किशोर बीजेपी में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। वह अवध क्षेत्र में पासी समाज के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने पार्टी में अपनी अनदेखी और कुछ नेताओं द्वारा उन्हें किनारे किए जाने की बात कही थी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के कुछ लोगों ने उनके खिलाफ काम किया। हालांकि कौशल किशोर ने यह स्पष्ट किया कि वह बीजेपी छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं और पार्टी की विचारधारा के साथ खड़े हैं।
इससे पहले उनकी सोशल मीडिया पोस्ट में ‘गेंद’ के तेजी से नीचे आने का जिक्र भी हुआ था। इस पोस्ट को लेकर यूपी बीजेपी की अंदरूनी राजनीति पर चर्चा तेज हुई थी।
हीरा ठाकुर के जाने से क्या बदलेगा?
बीजेपी के लिए दूसरी चिंता हीरा ठाकुर का पार्टी से अलग होना है। पूर्व एमएलसी और ओबीसी नेता हीरा ठाकुर ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है।
हीरा ठाकुर लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। वह सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और ओबीसी आयोग में भी महत्वपूर्ण पद पर रह चुके हैं। इसके अलावा विधान परिषद में उन्होंने कई अहम भूमिकाएं निभाईं।
ऐसे नेताओं का पार्टी से अलग होना केवल एक नेता के जाने तक सीमित नहीं रहता। स्थानीय स्तर पर उनके समर्थकों और सामाजिक संपर्कों का असर भी चुनावी राजनीति में दिखाई दे सकता है।
अवध में बीजेपी का सामाजिक समीकरण
2014 के बाद बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। पासी समाज इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इसके साथ साहू, नाई और अन्य पिछड़े-अतिपिछड़े समूहों को जोड़कर पार्टी ने अपना व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया।
अवध क्षेत्र में यह रणनीति बीजेपी के लिए काफी प्रभावी रही। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर पहले की तुलना में बदली हुई दिखाई दी। अवध की करीब 20 प्रमुख सीटों में बीजेपी को 9 सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 7 और कांग्रेस ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की।
फैजाबाद सीट पर बीजेपी की हार को विशेष रूप से बड़ा झटका माना गया। वहीं लखनऊ में राजनाथ सिंह की जीत का अंतर भी 2019 के मुकाबले काफी कम हुआ। इन परिणामों ने संकेत दिया कि क्षेत्र में बीजेपी का पुराना चुनावी समीकरण पहले जितना मजबूत नहीं रहा।
सपा-कांग्रेस के लिए मौका
बीजेपी के सामने पैदा हुई यह स्थिति विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकती है। सपा और कांग्रेस पहले से ही पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों के मुद्दों को लेकर बीजेपी पर हमला कर रही हैं।
अगर कौशल किशोर जैसे नेताओं की नाराजगी लंबे समय तक बनी रहती है और हीरा ठाकुर जैसे नेता पार्टी से बाहर जाते हैं, तो विपक्ष इसे बीजेपी के सामाजिक गठबंधन में दरार के तौर पर पेश कर सकता है।
हालांकि केवल नेताओं के पार्टी छोड़ने या नाराज होने से चुनावी नतीजे तय नहीं होते। असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इन नेताओं का अपने-अपने सामाजिक आधार और स्थानीय संगठन पर कितना प्रभाव है।
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सेंट्रल यूपी और अवध में बीजेपी के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखना होगा, वहीं दूसरी ओर नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ रखने की कोशिश करनी होगी।
कौशल किशोर ने फिलहाल बीजेपी छोड़ने का संकेत नहीं दिया है। इसलिए पार्टी नेतृत्व के पास उनकी नाराजगी दूर करने का अवसर मौजूद है। वहीं हीरा ठाकुर के कांग्रेस में जाने के बाद विपक्ष इस घटनाक्रम को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगा।
आने वाले महीनों में बीजेपी किस तरह संगठनात्मक स्तर पर इन चुनौतियों का जवाब देती है, यह काफी महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि सेंट्रल यूपी में मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की क्षमता का भी होगा।