गुलाबी नगरी जयपुर शनिवार शाम रंग, संगीत और परंपरा के अनोखे संगम से गूंज उठी। मौका था हरियाली तीज का, जब शहर की सड़कों पर हर साल निकलने वाली भव्य जयपुर तीज सवारी ने एक बार फिर पूरे राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच हजारों लोग सड़क किनारे जमा हुए और इस शाही जुलूस का हिस्सा बनी हर झांकी को आंखों में कैद करते रहे।
त्रिपोलिया गेट पर विधिवत आरती से शुरुआत
ऐतिहासिक त्रिपोलिया गेट के सामने जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य पद्मनाभ सिंह ने पारंपरिक रीति से तीज माता की आरती उतारी। इसी के साथ जयपुर तीज सवारी विधिवत रूप से शहर की गलियों की ओर रवाना हुई, जिसमें हजारों की भीड़ उत्साह के साथ शामिल हुई।
25 किलो की पगड़ी बनी आकर्षण का केंद्र
इस बार जयपुर तीज सवारी में बाड़मेर से आए लोक कलाकारों ने सबका ध्यान खींचा। इनमें से कुछ कलाकार सिर पर करीब 25 किलो वजनी पगड़ी बांधे नजर आए, जिसे संभालना अपने आप में एक कला है। भीड़ इस अनोखे हुनर को देखकर तालियां बजाती रही।
चरी नृत्य और कठपुतली कला ने बांधा समां
आगे बढ़ने पर चरी नृत्य ने माहौल को और रंगीन बना दिया। कलाकार सिर पर मटके संतुलित रखते हुए लयबद्ध तरीके से नाचते रहे। इसके साथ ही राजस्थान की मशहूर कठपुतली कला भी सवारी का हिस्सा बनी, जहां रंग-बिरंगी कठपुतलियां थिरकते हुए लोक संस्कृति की झलक दिखाती चलीं।
बेटियों की तलवारबाजी ने दिखाया शौर्य
भक्ति और लोक रंग के बाद जयपुर तीज सवारी में शौर्य का जज्बा भी नजर आया। शौर्य सेवा संगठन से जुड़ी बालिकाओं ने तलवारबाजी का प्रभावशाली प्रदर्शन कर सबको प्रभावित किया, जिसने राजस्थान की वीरता भरी परंपरा को दर्शाया।
शहर के 13 स्थानों पर LED स्क्रीन का इंतजाम
जो लोग सीधे त्रिपोलिया गेट तक नहीं पहुंच सके, उनके लिए भी खास व्यवस्था की गई थी। जयपुर के 13 प्रमुख स्थानों पर बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई गईं, ताकि शहरभर के लोग जयपुर तीज सवारी का सीधा नजारा देख सकें।
एक सवारी, पूरे राजस्थान की झलक
कुल मिलाकर जयपुर तीज सवारी सिर्फ एक धार्मिक जुलूस नहीं रही, बल्कि इसमें आस्था, राजसी परंपरा, लोक संगीत, फड़ गायन, घूमर और कालबेलिया जैसी विधाओं के जरिए राजस्थान की समूची सांस्कृतिक पहचान समा गई।