Madras High Court on Bhagavad Gita: मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि भगवद् गीता विशुद्ध धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक “नैतिक विज्ञान” और “भारतीय सभ्यता” का हिस्सा है। न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन गृह मंत्रालय के विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के तहत जारी आदेश के विरुद्ध अर्श विद्या परंपरा ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। एफसीआरए में ट्रस्ट का पंजीकरण विदेशी अंशदान निधि के पूर्व अनुमति के बिना प्राप्त धन और संगठन के धार्मिक स्वरूप के आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया था।
Madras High Court: ये है कोर्ट की टिपण्णी!
न्यायालय ने टिप्पणी की, “चूंकि याचिकाकर्ता भगवद् गीता में निहित संदेश का प्रचार-प्रसार भी करता है, इसलिए न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता एक धार्मिक संस्था है। भगवद् गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक विज्ञान है।” “भगवद् गीता पर जो बात लागू होती है, वही वेदांत पर भी लागू होती है। यह हमारे पूर्वजों द्वारा विकसित शुद्ध दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। योग के संदर्भ में, इसे धर्म के नजरिए से देखना घोर अन्याय होगा। यह एक सार्वभौमिक अवधारणा है,” अदालत ने कहा।
ये है पूरा मामला!
अर्शा विद्या परंपरा ट्रस्ट ने अधिनियम के तहत पंजीकरण के आवेदन के खिलाफ सितंबर 2021 में एफसीआरए द्वारा पारित एक आदेश के विरुद्ध अदालत के हस्तक्षेप की मांग करते हुए एक याचिका दायर की। एफसीआरए ने दो आधारों पर ट्रस्ट का आवेदन खारिज कर दिया। पहला, याचिकाकर्ता ने पूर्व अनुमति के बिना विदेशी अंशदान (एफसी) निधि प्राप्त की थी, और विदेशी अंशदान निधि को दान के रूप में किसी अन्य संगठन को हस्तांतरित किया गया था। दूसरा आधार यह था कि संगठन का स्वरूप धार्मिक प्रतीत होता है।
ट्रस्ट ने न्यायालय से संबंधित अभिलेख मंगवाने, विवादित आदेश को रद्द करने और अधिकारियों को अधिनियम के तहत पंजीकरण के लिए आवेदन को मंजूरी देने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। याचिकाकर्ता ने न्याय के हित में न्यायालय द्वारा उचित समझे जाने वाली किसी अन्य राहत की भी मांग की है।
कोर्ट ने दिया अपना फैसला!
अदालत ने आगे कहा कि आवेदक को “धार्मिक संगठन प्रतीत होने” के आधार पर प्राधिकरण ने प्रावधान में निर्धारित मानक का पालन नहीं किया है। यह देखते हुए कि ट्रस्ट ने 2021 में पंजीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन विचार-विमर्श की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 में ही शुरू हुई, अदालत ने कहा, “प्राधिकारियों से निष्पक्ष व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। यह सुशासन का मूलभूत सिद्धांत है।” न्यायालय ने माना कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन हुआ है। विवादित आदेश असंगतता के दोष से ग्रस्त है। इन परिस्थितियों में, याचिकाकर्ता इस न्यायालय से विवेकाधीन राहत पाने का हकदार है।
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