Save Aravalli: खनन और निर्माण को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट ढांचा तैयार किया है। इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि अरावली की भूमि की पहचान और विनियमन कैसे किया जाना चाहिए, जिससे राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुछ हिस्से प्रभावित होंगे।
Save Aravalli कैंपेन से जुड़ रहे लोग!
वही इस फैसले के बाद पर्यायवरण के लिए काम करने वाले समूहों ने चेतावनी दी है कि इस फैसले के बाद बड़े क्षेत्रों से संरक्षण हट सकता है। वहीं सरकारों का कहना है कि इस कदम से कानूनी स्पष्टता आती है और संरक्षण तथा विकास में संतुलन बना रहता है। इस निर्णय ने बहस, विरोध प्रदर्शनों और कड़े सुरक्षा उपायों की मांग को जन्म दिया है, क्योंकि अधिकारी संरक्षण उपायों को लागू करने पर काम कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने और क्या कहा!
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अरावली की ज़मीन की पहचान आधिकारिक रिकॉर्ड, सैटेलाइट तस्वीरों और ज़मीनी सत्यापन के आधार पर की जानी चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकारों को अवैध खनन पर अंकुश लगाने और पर्यावरण कानूनों को लागू करने का निर्देश भी दिया। अधिकारियों का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य अस्पष्टता को दूर करना और प्रशासनों को निर्णायक कार्रवाई करने में मदद करना है। वहीं दूसरी ओर पर्यावरण समूहों का तर्क है कि संकीर्ण परिभाषाएँ जंगलों, वन्यजीव गलियारों और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों के लिए लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा को कमजोर कर सकती हैं।
आखिर अरावली क्यों है ज़रूरी?
800 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले अरावली पर्वतमाला मरुस्थलीकरण को रोकने, जलवायु को नियंत्रित करने और जैव विविधता को संरक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्षों से अनियंत्रित खनन और शहरी विस्तार के कारण पर्वतमाला के बड़े हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिसके चलते इसे बचाने के लिए बार-बार कानूनी हस्तक्षेप और जन अभियान चलाने पड़े हैं।
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